What If Oceans Were Liquid Mercury?
क्या है ?
- जो चमकदार है
- तरल है
- जिसमें बिजली का संचार हो सकता है
- और जो एक महान रॉक स्टार का उपनाम भी है?
आप सही समझे, ये है मर्करी यानी पारा। इस प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पदार्थ के कई इस्तेमाल हैं पर ये बहुत ख़तरनाक भी है इसकी छोटी-सी मात्रा भी ज़हरीली हो सकती है।
तो क्या हो अगर हमारे सागर इससे भरे हों?
- क्या पृथ्वी liquid मर्करी से भरे सागरो सह सकती है ?
- हमारे ग्रह पर इसका क्या असर होगा ?
- इंसानी प्रजाति पर इसका क्या असर होगा ?
इससे पहले कि आप मर्करी के एक पूल में गोता लगाने जाएं हमें इसके गुणों के बारे में जान लेना चाहिए।
मर्करी इकलौता ऐसा धातु है जो सामान्य तापमान में तरल यानी लिक्विड रूप में पाया जाता है। पानी और मर्करी दोनों ही बढ़े हुए तापमान में गैस या भाप में बदल जाते हैं फिर भी एक पदार्थ के तौर पर मर्करी पानी की तरह टूटता नहीं। ये बस रूप बदलता है।
यही वजह है कि इसे अंदर लेना ज़हरीला साबित हो सकता है और क्योंकि ये अक्सर हमारी मिट्टी सागरों और खाए जाने वाले कुछ समुद्री जीवों में आसानी से जुड़ जाता है
इसलिए ये काफ़ी तेज़ी से हम तक पहुंच भी जाता है। इनमें से ज़्यादातर के पीछे की वजह है मानव-निर्मित मर्करी का उत्सर्जन जीवाश्म ईंधन का जलना सोने की माइनिंग या सिनेबार में से धातु का निकाला जाना।मर्करी एक मिश्रण या मेटल अलॉय के रूप में ख़ास तौर से काम आती है जिस वजह से ये पत्थरों में से सोना निकालने चांदी से दांतों की फिलिंग करने या ज़िंक के साथ मिलकर बैटरी की लाइफ़ बढ़ाने में काफ़ी कारगर होती है।
ये तापमान में बदलाव के साथ फैलती और सिकुड़ती भी है जिस के चलते ये तापमान नापने के यंत्र थर्मामीटर का एक ज़रूरी हिस्सा होती है। हालांकि ये बेहद उपयोगी है पर मर्करी से भरे एक पूरे सागर का हमारे ग्रह पर क्या असर होगा?
सबसे पहला बदलाव जो हमें नज़र आएगा वो होगी सागरों की सतह पर तैरती कई तरह की चीज़ें। खज़ाना ढ़ूंढ़ने वालों और रहस्यमयी समुद्री जीवों पर शोध करने वालों के लिए ये काफ़ी बढ़िया साबित होगा।
इतिहास में हर वो चीज़ जो डूब गई थी अब सतह पर उड़ती हुई वापस आ जाएगी जिससे हमारे सागर एक बड़ा तैरता हुआ कचरे का ढ़ेर दिखने लगेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि मर्करी पानी की तुलना में 13.5 गुना ज़्यादा घनी होती है यानी बेहद तरणशील।
आर्किमीडीज़ के सिद्धांत के मुताबिक़ एक तरल में डूबी हुई किसी चीज़ में ऊपर की तरफ लगने वाला उप्लावक बल उतने तरल के भार के बराबर होता है जितनी जगह उस चीज़ ने ली है। खारे पानी की तरह, मर्करी भी साफ़ पानी से ज़्यादा गाढ़ी होती है तो चीज़ें पानी के ऊपर तक तैर कर आएंगी पर ये संतुलन नहीं बना पाएंगी। यहां तक कि एक तिहाई भी नहीं!
तो तैयार हो जाइए बहादुर समुद्र यात्रियों! आपकी नावों का संतुलन जाने वाला है और ये गिरने वाली हैं। और अगर आप समुद्र में गिर गए तो आप एक छोटी-सी छपाक के साथ पानी के खिलौनों की तरह वापस ऊपर आ जाएंगे बल्कि, अगर आपके पास अच्छी फ्लिपर्स या शानदार संतुलन है तो आप समुद्र पर चलने की कोशिश कर सकते हैं।
लेकिन बातें बहुत हो गईं हमारे पास साधारण ज़रूरतों से जुड़ी बड़ी दिक्क़तें हैं।
सागरों में पानी ना बचने की वजह से हमें एक लैब में आर्टीफीशियल तरीक़ों से पानी तैयार करना होगा। हो सकता है हमारे पास पूरी दुनिया की आबादी की ज़रूरत जितना पानी बनाने के लिए ऊर्जा भी ना हो। शायद इस तबाही के बाद हम पानी के लिए रेगिस्तानों में लड़ाई शुरू कर दें! और ये भी तब होगा, जब हम ग्रह पर होने वाले बदलावों से ज़िंदा बच पाएंगे।
चौंकाने वाली बात है कि सागरों की जगह मर्करी भरने से पृथ्वी के वज़न में केवल 0.26 फ़ीसदी की बढ़त होगी। ख़ुश्क़िस्मती से इससे हमारे ऑर्बिट या गुरुत्वाकर्षण में कोई बड़े बदलाव नहीं होंगे पर पृथ्वी के मैंटल पर वज़न बढ़ने से टेक्टॉनिक प्लेटों पर दबाव बढ़ेगा। यानी पूरी पृथ्वी पर तबाही लाने वाले भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट होंगे।
इससे हर किसी की नहीं तो कुछ अरब लोगों की मौत तो ज़रूर होगी। आपका ये मर्करी के ख्वाबों का बुलबुला तोड़ने के लिए माफी चाहूंगा। अगर आप ज़िंदा बच भी जाते हैं तो वातावरण आपकी जान ले लेगा। मर्करी के बादल बनने लगेंगे और जिस हवा में हम सांस लेते हैं वो ज़हरीली मर्करी की भाप से भर जाएगी
- जिसके बाद घबराहट
- याददाश्त जाना
- और कंपकंपी जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल यानी तांत्रिकीय दिक्कतें आएंगी।
हमें हर वक़्त मास्क पहने रखना होगा और ढ़ेर सारी सन्स्क्रीन लगा कर रखनी होगी। इसकी चमकदार सतह की वजह से मर्करी का एल्बीडो या रिफ्लेक्टिविटी यानी रोशनी पलटने की क्षमता बर्फ़ से ज़्यादा होती है इसका मतलब हमें सूरज की और ज़्यादा रोशनी को झेलना होगा। इस बढ़ी हुई रेडिएशन से कूलिंग इफेक्ट हो सकता है जिससे पृथ्वी के तापमान में अच्छी ख़ासी गिरावट आ सकती है।
तो शायद यहां अच्छी बात ये है कि इससे वैश्विक तापमान के बढ़ने की समस्या का हल हो सकता है। हालांकि ये बहुत कम वक़्त के लिए ही होगा। क्योंकि इंसानी प्रजाति लिक्विड मर्करी से भरे ग्रह के ज़हरीले असर को लंबे वक़्त तक नहीं झेल सकेगी।
पर क्या आपने कभी ये सोचा है
कि क्या हो अगर आप लिक्विड मर्करी से भरे एक पूल में कूद जाएं?
जानने के लिए
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