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क्या हो अगर हम एक पैरलल यूनिवर्स का दरवाज़ा खोल सकें | Portal to a Parallel Universe?

Parallel Universe


    क्या हो अगर हमारे universe की तरह दूसरे ब्रह्माण्ड (universe) भी हों? 
  • जहां अनगिनत पृथ्वियां हों? 
  • और आपके भी अनगिनत वर्ज़न्स मौजूद हों? 
  • और क्या हो अगर हमें इन्हें ढ़ूंढ़ने के लिए ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत ना हो?

शायद हमारी रिएलिटी का एक मिरर वर्ज़न यानी आईने जैसा रूप


आप पढ रहे हैं 

‘‘क्या हो अगर’’

हमारे ब्रह्माण्ड की शुरुआत तब हुई थी जब 13.7 अरब साल पहले बिग बैंग में एक छोटा लेकिन बहुत गर्म सिंग्यूलैरिटी (singularity) फटा था। पर शायद उस वक़्त जन्म लेने वाला ये अकेला नहीं था। 



विज्ञान में, स्पेस और टाइम यानी अंतरिक्ष और समय चार डाइमेंशन्स यानी आयामों के कंटीन्यूअम (continuum)  स्पेस और टाइम कंटीन्यूअम  मे बन्धे होते है । अगर ये कंटीन्यूअम (continuum) यानी सातत्य चपटा होता है और हमारी ऑब्सर्वेशन यानी जो हम देख सकते हैं उसकी सीमा के पार जाता है तो हो सकता है कि इसमें ऐसे अनगिनत ब्रह्माण्ड मौजूद हों जो एक दूसरे से जुड़े हुए ना हों। 


पर जितना हम जानते हैं ऐसे सीमित तरीक़े हैं जिनमें उन दुनियाओं के कण साथ रखे जा सकते हैं। कुछ प्वाइंट्स पर, रिएलिटीज़ ख़ुद को दोहराना शुरू कर देंगी। इसका मतलब ये हुआ, कि थ्योरी में हमारी रिएलिटी यानी वास्तविकता एक बड़ी रिएलिटी का केवल एक छोटा हिस्सा है 



और आप जैसा कोई हमारे जैसे ही किसी पैरलल यूनिवर्स यानी समानांतर ब्रह्माण्ड में जी रहा होगा। और वो यूनिवर्स हमसे एक सेंटीमीटर के दस लाख दस खरबवें हिस्से की ही दूरी पर मौजूद हो सकता है।




हालांकि इन दुनियाओं के बीच की दीवार बेहद छोटी हो सकती है पर इनके बीच का सफ़र इतना आसान नहीं होगा। लेकिन ये कर पाना मुमक़िन है। बस आपको 85-मेगावॉट के एक ऐसे रिएक्टर की ज़रूरत होगी



जिससे आपके order पर अरबों न्यूट्रॉन्स फायर हो सकते हों। टेनिसी की ओक रिज लैबोरेटरी में काम करने वाले वैज्ञानिक एक मिरर यूनिवर्स का दरवाज़ा खोलने के लिए यही तरीक़ा अपना रहे हैं। ज़ाहिर है पहले उन्हें ये दरवाज़ा ढ़ूंढ़ना होगा।


ये सब एक थ्योरी से आता है जिसके मुताबिक़, अगर आप एक दीवार पर न्यूट्रॉन्स की बौछार करते हैं तो कोई भी न्यूट्रॉन पार नहीं होगा। अगर इनमें से कुछ पार हो जाते हैं तो इसका मतलब होगा कि वो दो दुनियाओं के बीच की दीवार को पार करते वक़्त ख़ुद की मिरर इमेज में तब्दील हो गए हैं।


हमे इन सब के बारे मे पता भी केसे लगा 




न्यूट्रॉन्स के बारे में एक बात थोड़ी अजीब है। पार्टिकल बीम्स में, ये औसतन 14 मिनट और 48 सेकेंड तक बने रहने के बाद डिके होकर प्रोटॉन में बदल जाते हैं। पर अगर आप इन्हें एक लैब बॉटल में रखेंगे तो ये 10 सेकेंड ज़्यादा तेज़ी से टूटते हैं। अब तक में विज्ञान की मदद से इसे समझाया नहीं जा सका है।


सभी न्यूट्रॉन्स एक से होते हैं और चाहे इन्हें कहीं भी रखा जाए, इनके जीवन काल में कोई भी 10-सेकेंड का अंतर नहीं होना चाहिए। क्या ऐसा मुमक़िन है कि न्यूट्रॉन के साथ किए गए प्रयोग उम्मीद के मुताबिक़ इसलिए नहीं हुए क्योंकि वैज्ञानिकों ने ग़लती से किसी मिरर वर्ल्ड का दरवाज़ा खोल दिया था ? 



ये इस बात का पहला सबूत होगा कि हमारे यूनिवर्स के ठीक बगल में एक मिरर यूनिवर्स वजूद में है एक मिरर वर्ल्ड जिसमें मिरर अणु हैं और शायद एक मिरर पृथ्वी भी। हमारी दुनिया से पूरी तरह से कटा हुआ, एक सम्पूर्ण मिरर वर्ल्ड। क्या आप उस मिरर वर्ल्ड में ख़ुद के दूसरे वर्ज़न से मिल सकते हैं ?
 


अब यहां बात थोड़ी पेचीदा हो जाती है। हालांकि कणों की आकृतियां ख़ुद को दोहरा सकती हैं पर ठीक हमारी दुनिया जैसे किसी पैरलल यूनिवर्स के दरवाज़े मिलने की संभावना लगभग शून्य है। 



ज़रा सोचिए इसके बारे में।

इस ब्रह्माण्ड में नोवमविजंटेलियन कण हैं। यानी एक नंबर के पीछे 90 ज़ीरो लगने वाली संख्या। इनमें से हर कण के साथ 13.7 अरब सालों में वही चीज़ें हुई होनी ज़रूरी हैं तब जाकर ठीक हमारे जैसी दुनिया बन सकती है। 


काफ़ी संभावना है कि मिरर यूनिवर्स में विज्ञान के अपने मिरर नियम हों। लेकिन पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि किसी को भी आज तक एक भी मिरर कण नहीं मिला है। शायद, हमें अपने जवाब लैब में नहीं ढ़ूंढ़ने चाहिए। शायद हमें अंतरिक्ष में ये खोज करनी चाहिए।


हमारा ब्रह्माण्ड डार्क मैटर से भरा हुआ है। हम सीधे इस पर शोध नहीं कर सकते और हम नहीं जानते कि ये किससे बना है या कैसे काम करता है। पर हम ये जानते हैं कि डार्क मैटर इतना ताक़तवर है कि ये एक दूसरे से दूर उड़ती गैलेक्सियों को रोक सकता है।


फिर भी, हम इसकी खोज नहीं कर पा रहे हैं। शायद, इसकी वजह ये है कि डार्क मैटर किसी मिरर वर्ल्ड से लीक होकर हमारी दुनिया में आ रहा है। अगर हम इसे ढ़ूंढ़ पाते हैं तो ये बात पक्की हो जाएगी कि एक मिरर यूनिवर्स है। क्योंकि हम ये जानते हैं कि ब्रह्माण्ड में आंखों को दिखने वाले मैटर से 5 गुना ज़्यादा डार्क मैटर है


तो आप ये समझ सकते हैं कि एक मिरर यूनिवर्स उस दुनिया से कहीं बड़ा होगा जिसमें हम रहते हैं। अगर हम दूसरी दुनिया का दरवाज़ा खोल भी लेते हैं तो ये दरवाज़ा बेहद छोटा होगा इतना छोटा कि किसी ताक़तवर लैब उपकरण के बग़ैर इसके पार देखना मुमक़िन नहीं होगा। 


याद रहे, हम अब भी न्यूट्रॉन्स और प्रोटॉन्स के साथ ही डील कर रहे होंगे। आप उस जगह तक तभी जा सकेंगे जब आप सिकुड़ कर एक अणु के आकार के हो सकते हों।


लेकिन इस पर चर्चा के लिए

देखते रहें

‘‘क्या हो अगर’’

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